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ऐसी हो इस बार की होली



जल जाए बुराई, फैले खुशियां, 
शांति सदभाव हो, चारो ओर।
रंग बिरंगे रंगो में रंगे लोगो,
के मन में हो एक की रंग।
ऐसी हो इस बार की होली।

अहम, घमंड, द्वेष जलाए
दूसरो की खुशी में खुश हो,
ईर्षा मन में न हो
प्रभु भक्ति, प्रेम की मिठास
ऐसी हो इस बार की होली।



तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

न जाने क्यों ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
कुछ उलझन सी है मन में,
समझ नही आ रहा क्यों?
पर ऐसा लग रहा है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
छल कपट झूट जो दिखता हैं,
उससे तो यही लगता है कि,
जो सत्य का पथिक है वही,
परेशान व पराजित भी है।
हो सकता है हो अलग अलग,
सबका अपना अपना सत्य।
पर सत्य तो सर्वव्यापक है न ?
सबका अलग अलग तो नही ?
फिर भी क्यों अजीब सी उलझन है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

अपने विचार रखे

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