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न जाने क्या हो अगले पल।



न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
उसकी उंगली पर नाच रहे है।
अपने अतीत के खट्टे मीठे 
पल एहसास दिलाते हैं ये सब
फिर सबक नहीं सीखा है कि
हम तो राहगीर है  वो,
जहा चाहे वहां ले जाए
हमे भी इस बात पर यकीन है,
वो जो भी करेगा सही होगा,
हर पल हर कर्म हर दिन
ये न भूले हम याद रहे,
न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
हम सब माटी के पुतले है,
हवा, पानी, बरसात, 
में भी निरंतर चलना है,
कोई काम नही अपना,सब उसका। 
जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा
वही होगा जो वो चाहेगा,
बनाना बिगड़ना, रुकना चलना,
सब उसका कुछ नहीं अपना,
न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
उसकी उंगली पर नाच रहे है।

तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

न जाने क्यों ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
कुछ उलझन सी है मन में,
समझ नही आ रहा क्यों?
पर ऐसा लग रहा है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
छल कपट झूट जो दिखता हैं,
उससे तो यही लगता है कि,
जो सत्य का पथिक है वही,
परेशान व पराजित भी है।
हो सकता है हो अलग अलग,
सबका अपना अपना सत्य।
पर सत्य तो सर्वव्यापक है न ?
सबका अलग अलग तो नही ?
फिर भी क्यों अजीब सी उलझन है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

मासाब है न !


कुछ भी काम हो
दिन हो या रात हो,
सुबह या शाम हो,
जनवरी हो या मई हो,
अरे मासाब है न।
घर हो या बाहर हो,
सरकारी हो या प्राइवेट हो,
काम कुछ भी हो, 
मासाब है  न लगा दो काम पे।
खल्लासी का हो, या कंडक्टर का,
चपरासी का हो या चौकीदार का,
शमशान का हो या कब्रिस्तान का,
मतगणना का हो या जनगणना का
क्षमा  का हो या अपमान का,
छोटा हो या बड़ा, 
चुनाव हो या कुछ भी,
नेता का हो या अभी नेता का,
मासाब है न, लगा दो।
मना नहीं करते,
काम पूरा जवाबदारी से,
बिना सेवा शुल्क, 
बिना पेंशन के, 
आधा नही पूरा होगा।
मासाब है न।


अपने विचार रखे

अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार  सबके अपने अपने । दोन...

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