मेरा छोटा सा प्रयास है, अपने विचारों को कविता के माध्यम से रखने का। कुछ त्रुटी हो सकती है, अपने सुझाव जरूर दे।
अर्जुन बन जाऊ
आंख बंद
आंख बंद करके सोशल मीडिया को धरती पर विश्वास, चलते हैं ये लोग जीवन की अनदेखी के संग।
खोये हुए हैं वो खुद को इस व्यस्तता में, रंगी हुई दुनिया में, खो गए अपनी पहचान।
लगाते हैं विश्वास उन पोस्टों की आँधी में, जो छिड़कती हैं झूलती समाज की विभिन्न रंगिनी।
जीवन के असली मोमेंट्स से दूर चलते हैं ये लोग, खोये हुए हैं स्वयं को अपनी ही सोच की झूली में।
आंखों की जगह इन्टरनेट ने हमें ले ली है, सच्चाई के आईने अब नजदीक आते ही छिप जाते हैं।
खराब होते हैं अपने आपसी संबंध इन मशीनों के सामर्थ्य में, ज़िन्दगी की सौभाग्यशाली रेलगाड़ी से हो गयी है वो वंचित।
समय खरीदते हैं इन्टरनेट के मोल बाजार, भूल गए हैं वो साथी, जो हैं सच्चे और अमानतदार।
ज़िंदगी जीने का वो मज़ा छिप गया है जहां, आंख खोलो, विश्वास रखो, और साथी ढूंढो अपने मन के कोनों में।
न जाने क्या हो अगले पल।
दिया तले अंधेरा
अग्निपरीक्षा
सत्य की परख के लिए,
मेरी मर्यादा
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
अपने अपने राम और श्याम
अपने विचार रखे
अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार सबके अपने अपने । दोन...
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