फिर भी क्यों? लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फिर भी क्यों? लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

फिर भी क्यों ?

,

ओ तो जगतपालनहार प्रिया
लक्ष्मीअवतार है न,
पल में क्या नही कर सकती,
कल्पना से परे है न,
फिर भी क्यों ?

 

नंगें पाव वन गमन,
कुटिया मेंं  निवास
पकवान नही फलों का सेवन
क्यों क्यों आखिर क्यों ?

फिर भी लक्ष्मी स्वरूपा का, 
पापी नीच करता अपहरण
क्यों असहाय विलाप
जिसकी इच्छा मात्र से,
प्रलय हो भयंकर , 
उसका अधम करता अपहरण
आखिर फिर भी क्यों ?

 

जिसके एक तिनके से,
भयभीत त्रिलोक विजई, 
जिस पर रावण दृष्टि तक न,
ठहर पाई, फिर भी क्यों ?
अग्नि् परीक्षा की घड़ी आई।
अग्नि् परीक्षा देने पर भी,
तोहमत लगाई।
फिर वन वन भटके सीता माई,
जगदीश पत्नी है न, 
फिर भी क्यों ?
जिनके एक आवाज पर
पालन हार क्या न कर सकते,
धरती भी थी थर्राई, 
फिर भी क्यों ?
गोद में जिसके समाई




यह कविता एक प्रश्न है आप खुद विचार करे । 




कफ़न में जेब नही होती !


खूब कर लो मुनाफाखोरी, 
खूब कर लो जमाखोरी
कर लो कालाबाजारी,
जितनी कर लो घूसखोरी,
याद रखना जरूरी है कि,
कफ़न में जेब नही होती।१।
जितना सताना है सतालो,
मासूमों, गरीबों, जरूरतमंदों,
की मजबूरी का फायदा लेलो।
मन नहीं भरा तुम्हारा, 
अरबो से, खरबों कमा लो,
पर याद रखना साहेब,
कफ़न में जेब नही होती।२।
थोड़ी तो शर्म कर लो,
अजीब हो तुम तो,
कफ़न का व्यापारी भी,
ईमान रखता है पर,
कफ़न ही क्या मुर्दा बेच खा गए,
जिंदा को मुर्दा बनाया है तुमने,
मुर्दा को जिंदा बनाओ तो जाने,
इसलिए कहता हूं भूलना मत,
कफ़न में जेब नही होती।३।
सब कुछ यही होना है,
यही स्वर्ग यही नर्क है,
यही होगा कर्मो का लेखा जोखा,
तुम्हे क्या लगा चित्रगुप्त सोए है,
बहुत बड़ी भूल कर रहे हो,
तुम्हारा भी वक्त आएगा।
सब यही धरा का धरा रह जायेगा।
कुछ भी साथ नहीं जायेगा,
क्योंकि कफ़न में जेब नही होती।४।



<data:blog.pageName/> |<data:blog.title/> <data:blog.pageTitle/>

मोर और उल्लू


  

मोर और उल्लू, दोनो

 अलग अलग

 मोर विद्या वाहन,  तो उल्लू लक्ष्मी। 

दोनो एक साथ रहे, संभव नहीं। 

पर आज उल्लू  ज्यादा चर्चित।

 हर कोई उल्लू बनना चाहता है।

जो क्लास में उल्लू थे,

आज मोर के आगे है।

मोर बेचारा मेहनत करके परेशान,

मेहनत न करना उल्लू का काम।

.

अपने विचार रखे

अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार  सबके अपने अपने । दोन...

एक नजर इधर भी