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मेरी मर्यादा



श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
उनका आदर्श मार्ग अपना सकू,
कोशिश तो जरूर की है मैने,
पर उनकी बराबरी तो संभव नहीं।
कोशिश जरूर है कि मर्यादा में रहूं,
कोई न कोई रावण ऐसा तो हो है,
विवश तो मुझे करता है,
जो लक्ष्मण रेखा पार करने को,
मां सीता से सीखा है मैने,
सरल सहज स्वभाव,
शायद इसलिए नही समझता
असुरों का चाल चरित्र चेहरा।
पर क्या करू मेरा आदर्श,
मुझे झंझोड़ता है क्योंकि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
फिर ये भी याद रखना जरूरी,
शील , सेवा, बड़ो का सम्मान,
भरतजी ने भी तो दी है सीख।
हां ये सच है कि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।




ऐसी हो इस बार की होली



जल जाए बुराई, फैले खुशियां, 
शांति सदभाव हो, चारो ओर।
रंग बिरंगे रंगो में रंगे लोगो,
के मन में हो एक की रंग।
ऐसी हो इस बार की होली।

अहम, घमंड, द्वेष जलाए
दूसरो की खुशी में खुश हो,
ईर्षा मन में न हो
प्रभु भक्ति, प्रेम की मिठास
ऐसी हो इस बार की होली।



तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

न जाने क्यों ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
कुछ उलझन सी है मन में,
समझ नही आ रहा क्यों?
पर ऐसा लग रहा है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
छल कपट झूट जो दिखता हैं,
उससे तो यही लगता है कि,
जो सत्य का पथिक है वही,
परेशान व पराजित भी है।
हो सकता है हो अलग अलग,
सबका अपना अपना सत्य।
पर सत्य तो सर्वव्यापक है न ?
सबका अलग अलग तो नही ?
फिर भी क्यों अजीब सी उलझन है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

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