मेरा व्यहार,मेरा चरित्र,मेरे विचार,
कोई अपना-पराया आहत तो नही,
कई बार मन में तूफान सा उठता है,
फिर वही निरूत्तर प्रश्न,
क्या मैं सही हूं ?
कोई अपना ही आहत कर देता है,
लगता है नही कुछ तो कमी सी है,
मुझमें या फिर अपनो में,
अपनो की गलती ढुंढना,
ये तो ठीक नही है.
फिर वही क्या मैं सही हूं?
ऐसा हुआ क्यों, पता नही.
कही न कही कुछ तो चूक हुई,
शायद मुझसे पर क्या पता नही,
क्यों न स्व आकलन कर लू?
इन सब बातों का उत्तर ढूंढ लू,
मुझे पक्का विश्वास है,
होगा फिर सब ठीक,
जरूर करूंगा स्व आकलन।

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