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न जाने क्या हो अगले पल।



न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
उसकी उंगली पर नाच रहे है।
अपने अतीत के खट्टे मीठे 
पल एहसास दिलाते हैं ये सब
फिर सबक नहीं सीखा है कि
हम तो राहगीर है  वो,
जहा चाहे वहां ले जाए
हमे भी इस बात पर यकीन है,
वो जो भी करेगा सही होगा,
हर पल हर कर्म हर दिन
ये न भूले हम याद रहे,
न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
हम सब माटी के पुतले है,
हवा, पानी, बरसात, 
में भी निरंतर चलना है,
कोई काम नही अपना,सब उसका। 
जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा
वही होगा जो वो चाहेगा,
बनाना बिगड़ना, रुकना चलना,
सब उसका कुछ नहीं अपना,
न जाने क्या हो अगले पल,
रचनाकार के रंगमंच पर,
एक किरदार निभा रहे है,
उसकी उंगली पर नाच रहे है।

अग्निपरीक्षा



सत्य की परख के लिए,
सतत विश्वाश के लिए,
भ्रांति भ्रम दूर करने के लिए,
नितांत जरूरी है, अग्निपरीक्षा।
विद्वत्ता ज्ञान विकास के लिए,
व्यक्तित्व विकास के लिए,
कर्तव्य निर्वाह के लिए
नितांत जरूरी है,अग्निपरीक्षा ।
डर भय दुख के विनाश के लिए,
सुख शांति सदभाव के लिए,
दुराचार अत्याचार विनाश के लिए,
नितांत जरूरी है,अग्निपरीक्षा ।



मेरी मर्यादा



श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
उनका आदर्श मार्ग अपना सकू,
कोशिश तो जरूर की है मैने,
पर उनकी बराबरी तो संभव नहीं।
कोशिश जरूर है कि मर्यादा में रहूं,
कोई न कोई रावण ऐसा तो हो है,
विवश तो मुझे करता है,
जो लक्ष्मण रेखा पार करने को,
मां सीता से सीखा है मैने,
सरल सहज स्वभाव,
शायद इसलिए नही समझता
असुरों का चाल चरित्र चेहरा।
पर क्या करू मेरा आदर्श,
मुझे झंझोड़ता है क्योंकि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
फिर ये भी याद रखना जरूरी,
शील , सेवा, बड़ो का सम्मान,
भरतजी ने भी तो दी है सीख।
हां ये सच है कि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।




तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

न जाने क्यों ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
कुछ उलझन सी है मन में,
समझ नही आ रहा क्यों?
पर ऐसा लग रहा है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
छल कपट झूट जो दिखता हैं,
उससे तो यही लगता है कि,
जो सत्य का पथिक है वही,
परेशान व पराजित भी है।
हो सकता है हो अलग अलग,
सबका अपना अपना सत्य।
पर सत्य तो सर्वव्यापक है न ?
सबका अलग अलग तो नही ?
फिर भी क्यों अजीब सी उलझन है,
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?

अपने अपने राम और श्याम



सच ही कहा है,
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अपनी अपनी सुविधा अनुरूप,
अपने अपने राम और श्याम।
हनुमान के अपने राम,
लक्ष्मण के अपने राम,
सीता के अपने राम,
कौशल्या, कैकेई, दशरथ,
भरत, विभीषण, सुग्रीव के,
सबके अपने अपने राम।
राधा, मीरा,अर्जुन, सुदामा,
रूखमणी, यशोदा, देवकी,
सबके अपने अपने श्याम।
तो फिर आज भी वही है न,
कोई कहे हे राम, कोई राम राम,
तो कोई राम राम राम राम,
किसी के जय जय श्री राम, 
तो किसी के जय सियाराम,
सोच अपनी अपनी,  सुविधा अपनी अपनी,
और अपने अपने राम और श्याम।
राम तो राम है और श्याम तो श्याम,
मर्यादा, मित्रता, पितृ भक्ति, दुष्ट दलन,
राजधर्म, सेवा भक्ति योग-संयोग-वियोग,
जन-धन, शुभ-लाभ, अणु-परमाणु,
सबमें तो है राम और श्याम,
नही है तो सब निरर्थक बेकार।
सोच अपनी अपनी सुविधा अपनी अपनी,
और तो और, अपने अपने राम और श्याम।



मन में हो विश्वास




सब  संभव हो जाता है, जब मन में हो विश्वास।
श्रद्धा सयम प्रयत निरंतर, ध्येय पर हो नज़र।।
ईश भी उनका साथ देता है, जो स्वयं का देता।
सब संभव हो जाता है, जब मन में हो विश्वास।।
देश काल परिस्थिति पर होता नियंत्रण उसका।
होता स्वयं पर नियंत्रण लक्ष निश्चित हो उसका।।
कुछ करने की हो इच्छा तो , क्या नही होता।
सब संभव हो जाता है, जब मन में हो विश्वास।।


अपने विचार रखे

अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार  सबके अपने अपने । दोन...

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