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एक शिक्षक की पीड़ा



आम जनता जो, 
सरकारी स्कूल में बच्चों को नही पढ़ाती, 
जिनकी नजरों में चमक धमक पड़ती
न कि शिक्षक की योग्यता ।
शिक्षक जो है
बैठे की तनखा लेता,
ओ भी सबसे ज्यादा 
क्या करता है , निठल्ला 
यही धारणा आम है।
पर ऐसा क्यो ?
सरकारी तंत्र के लिए,
हर काम के लिए,
मासाब है न।
काम होना चाहिए,
पढ़ाई हो या न हो,
स्कूल खुलना चाहिए,
शिक्षक हो या न हो।
स्कूल नही प्रयोग शाला है,
हर साल नए प्रयोग,
शिक्षक जो है तो
बाबू ,चपरासी, खल्लासी,
की क्या जरूरत ?
इतना गया बीता है शिक्षक,
हर कोई उसे दुत्कारते
सम्मान के लिए भी फार्म भरवाते,
कुंठित खुद ही शिक्षक दिवस मनाते।
ये सबके सम्मान में पीछे नहीं हटते,
पर खुद ही सम्मान को तरसते ?
गलती किसकी है केवल शिक्षक की,
हजार सगठन बनाके खुद ही,
लल्लो चप्पो, चापलूसी करते ?
इसीलिए गुरु नही शिक्षक कहलाते।



कफ़न में जेब नही होती !


खूब कर लो मुनाफाखोरी, 
खूब कर लो जमाखोरी
कर लो कालाबाजारी,
जितनी कर लो घूसखोरी,
याद रखना जरूरी है कि,
कफ़न में जेब नही होती।१।
जितना सताना है सतालो,
मासूमों, गरीबों, जरूरतमंदों,
की मजबूरी का फायदा लेलो।
मन नहीं भरा तुम्हारा, 
अरबो से, खरबों कमा लो,
पर याद रखना साहेब,
कफ़न में जेब नही होती।२।
थोड़ी तो शर्म कर लो,
अजीब हो तुम तो,
कफ़न का व्यापारी भी,
ईमान रखता है पर,
कफ़न ही क्या मुर्दा बेच खा गए,
जिंदा को मुर्दा बनाया है तुमने,
मुर्दा को जिंदा बनाओ तो जाने,
इसलिए कहता हूं भूलना मत,
कफ़न में जेब नही होती।३।
सब कुछ यही होना है,
यही स्वर्ग यही नर्क है,
यही होगा कर्मो का लेखा जोखा,
तुम्हे क्या लगा चित्रगुप्त सोए है,
बहुत बड़ी भूल कर रहे हो,
तुम्हारा भी वक्त आएगा।
सब यही धरा का धरा रह जायेगा।
कुछ भी साथ नहीं जायेगा,
क्योंकि कफ़न में जेब नही होती।४।



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मासाब है न !


कुछ भी काम हो
दिन हो या रात हो,
सुबह या शाम हो,
जनवरी हो या मई हो,
अरे मासाब है न।
घर हो या बाहर हो,
सरकारी हो या प्राइवेट हो,
काम कुछ भी हो, 
मासाब है  न लगा दो काम पे।
खल्लासी का हो, या कंडक्टर का,
चपरासी का हो या चौकीदार का,
शमशान का हो या कब्रिस्तान का,
मतगणना का हो या जनगणना का
क्षमा  का हो या अपमान का,
छोटा हो या बड़ा, 
चुनाव हो या कुछ भी,
नेता का हो या अभी नेता का,
मासाब है न, लगा दो।
मना नहीं करते,
काम पूरा जवाबदारी से,
बिना सेवा शुल्क, 
बिना पेंशन के, 
आधा नही पूरा होगा।
मासाब है न।


मोर और उल्लू


  

मोर और उल्लू, दोनो

 अलग अलग

 मोर विद्या वाहन,  तो उल्लू लक्ष्मी। 

दोनो एक साथ रहे, संभव नहीं। 

पर आज उल्लू  ज्यादा चर्चित।

 हर कोई उल्लू बनना चाहता है।

जो क्लास में उल्लू थे,

आज मोर के आगे है।

मोर बेचारा मेहनत करके परेशान,

मेहनत न करना उल्लू का काम।

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अपने विचार रखे

अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार  सबके अपने अपने । दोन...

एक नजर इधर भी