आम जनता जो,
सरकारी स्कूल में बच्चों को नही पढ़ाती,
जिनकी नजरों में चमक धमक पड़ती
न कि शिक्षक की योग्यता ।
शिक्षक जो है
बैठे की तनखा लेता,
ओ भी सबसे ज्यादा
क्या करता है , निठल्ला
यही धारणा आम है।
पर ऐसा क्यो ?
सरकारी तंत्र के लिए,
हर काम के लिए,
मासाब है न।
काम होना चाहिए,
पढ़ाई हो या न हो,
स्कूल खुलना चाहिए,
शिक्षक हो या न हो।
स्कूल नही प्रयोग शाला है,
हर साल नए प्रयोग,
शिक्षक जो है तो
बाबू ,चपरासी, खल्लासी,
की क्या जरूरत ?
इतना गया बीता है शिक्षक,
हर कोई उसे दुत्कारते
सम्मान के लिए भी फार्म भरवाते,
कुंठित खुद ही शिक्षक दिवस मनाते।
ये सबके सम्मान में पीछे नहीं हटते,
पर खुद ही सम्मान को तरसते ?
गलती किसकी है केवल शिक्षक की,
हजार सगठन बनाके खुद ही,
लल्लो चप्पो, चापलूसी करते ?
इसीलिए गुरु नही शिक्षक कहलाते।



