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फिर भी क्यों ?

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ओ तो जगतपालनहार प्रिया
लक्ष्मीअवतार है न,
पल में क्या नही कर सकती,
कल्पना से परे है न,
फिर भी क्यों ?

 

नंगें पाव वन गमन,
कुटिया मेंं  निवास
पकवान नही फलों का सेवन
क्यों क्यों आखिर क्यों ?

फिर भी लक्ष्मी स्वरूपा का, 
पापी नीच करता अपहरण
क्यों असहाय विलाप
जिसकी इच्छा मात्र से,
प्रलय हो भयंकर , 
उसका अधम करता अपहरण
आखिर फिर भी क्यों ?

 

जिसके एक तिनके से,
भयभीत त्रिलोक विजई, 
जिस पर रावण दृष्टि तक न,
ठहर पाई, फिर भी क्यों ?
अग्नि् परीक्षा की घड़ी आई।
अग्नि् परीक्षा देने पर भी,
तोहमत लगाई।
फिर वन वन भटके सीता माई,
जगदीश पत्नी है न, 
फिर भी क्यों ?
जिनके एक आवाज पर
पालन हार क्या न कर सकते,
धरती भी थी थर्राई, 
फिर भी क्यों ?
गोद में जिसके समाई




यह कविता एक प्रश्न है आप खुद विचार करे । 




अपने अपने राम और श्याम



सच ही कहा है,
जाकी रही भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अपनी अपनी सुविधा अनुरूप,
अपने अपने राम और श्याम।
हनुमान के अपने राम,
लक्ष्मण के अपने राम,
सीता के अपने राम,
कौशल्या, कैकेई, दशरथ,
भरत, विभीषण, सुग्रीव के,
सबके अपने अपने राम।
राधा, मीरा,अर्जुन, सुदामा,
रूखमणी, यशोदा, देवकी,
सबके अपने अपने श्याम।
तो फिर आज भी वही है न,
कोई कहे हे राम, कोई राम राम,
तो कोई राम राम राम राम,
किसी के जय जय श्री राम, 
तो किसी के जय सियाराम,
सोच अपनी अपनी,  सुविधा अपनी अपनी,
और अपने अपने राम और श्याम।
राम तो राम है और श्याम तो श्याम,
मर्यादा, मित्रता, पितृ भक्ति, दुष्ट दलन,
राजधर्म, सेवा भक्ति योग-संयोग-वियोग,
जन-धन, शुभ-लाभ, अणु-परमाणु,
सबमें तो है राम और श्याम,
नही है तो सब निरर्थक बेकार।
सोच अपनी अपनी सुविधा अपनी अपनी,
और तो और, अपने अपने राम और श्याम।



अपने विचार रखे

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