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मेरी मर्यादा



श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
उनका आदर्श मार्ग अपना सकू,
कोशिश तो जरूर की है मैने,
पर उनकी बराबरी तो संभव नहीं।
कोशिश जरूर है कि मर्यादा में रहूं,
कोई न कोई रावण ऐसा तो हो है,
विवश तो मुझे करता है,
जो लक्ष्मण रेखा पार करने को,
मां सीता से सीखा है मैने,
सरल सहज स्वभाव,
शायद इसलिए नही समझता
असुरों का चाल चरित्र चेहरा।
पर क्या करू मेरा आदर्श,
मुझे झंझोड़ता है क्योंकि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।
फिर ये भी याद रखना जरूरी,
शील , सेवा, बड़ो का सम्मान,
भरतजी ने भी तो दी है सीख।
हां ये सच है कि,
श्री राम से सीखी है,मेरी मर्यादा।




मासाब है न !


कुछ भी काम हो
दिन हो या रात हो,
सुबह या शाम हो,
जनवरी हो या मई हो,
अरे मासाब है न।
घर हो या बाहर हो,
सरकारी हो या प्राइवेट हो,
काम कुछ भी हो, 
मासाब है  न लगा दो काम पे।
खल्लासी का हो, या कंडक्टर का,
चपरासी का हो या चौकीदार का,
शमशान का हो या कब्रिस्तान का,
मतगणना का हो या जनगणना का
क्षमा  का हो या अपमान का,
छोटा हो या बड़ा, 
चुनाव हो या कुछ भी,
नेता का हो या अभी नेता का,
मासाब है न, लगा दो।
मना नहीं करते,
काम पूरा जवाबदारी से,
बिना सेवा शुल्क, 
बिना पेंशन के, 
आधा नही पूरा होगा।
मासाब है न।


अपने विचार रखे

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