जमाना जाएं लेत लेने हमे क्या,
कोई काम बने या बिगड़े,
हम नही बदलेंगे अपनी सोच।
हम तो कभी नही सुधरेंगे,
दूसरो पर रोब जताना,
हर काम अपने ढंग से करवाएंगे
खुद न किया न करेंगे,
हम नही बदलेंगे अपनी सोच।
जो कहा हमने ओ पत्थर की लकीर,
आखिर हम भी है लकीर के फकीर
कोई भी परिवर्तन मंजूर नहीं
हम नही बदलेंगे अपनी सोच।
ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर
की कड़ी हम ही तो है,
ऊपर नीचे दोनो हम से,
काम बनाता- बिगड़ता हमसे
हम नही बदलेंगे अपनी सोच।

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