ऐसा मेरे साथ ही क्यों ?
कई बार मन में विचार आता है,
क्या और कोई नही दुनिया में,
मै ही अकेला हूं बाकी सब नही,
कर्म तो सब को करना है न ,
पर क्या सब स्वकर्म करते है,
इसके बाद मन में विचार आता है,
ऐसा मेरे साथ ही क्यों ?
तो फिर क्या करे किसको बताए
जगदीश भी कहते है कर्मन्ये वाधिकारस्ते,
जो अकर्मण्य है उनका क्या,
कब बदलेगी तस्वीर ये,
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