सफ़र



जिंदगी ,एक सफ़र ही तो है,
आज यहां, कल और कही ,
परसो कहां , 
सफ़र तो सफर है,
अनुकूल हो या, प्रतिकूल
सुखद हो या दुखद
रो के करो या हस के
बोझ समझो तो बोझ
ना तो फिर मौज।
जाने अनजाने
परिचित अपरिचित
तो मिलेंगे ही
सबका अपना अपना
तय तो करना ही है
सफ़र ही तो है
रास्ता कैसा भी हो
सुगम सहज हो न हो
मंजिल तो तय है
आगे बढ़ना ही है
रुकना नहीं, 
रोड़े तो आयेंगे 
और हट जाएंगे।
हर वक्त मौज मस्ती 
और सुख 
तो होगा नही न।
सफ़र हैं
तो आगे बढ़ना है।


वक्त आने दे ,

 
वक्त आने दे ,
एहसास  करवा देंगे,
हम किसके वंशज है।
बनना, बिगड़ना हम से है,
ज्ञान विज्ञान जमी आसमा
लय प्रलय हमसे है,
आचार विचार सोच एहसास
देश विदेश अखिल ब्रम्हांड
हम क्या है, कौन है 
वक्त आने दे , 
एहसास करवा देंगे।
कम मत समझो,
मान सम्मान करते है हम,
पर हमारा भी तो हो,
हमारी उपेक्षा , हमे अनसुना
करने की भूल , 
कही का नही छोड़ेगी
अभी वक्त है, नही तो
वक्त आने दे , 
एहसास करवा देंगे।

   To be continued......


मेरी गलती नही !



जो किया जो हुआ जो होगा
उसमे मेरी गलती नही,
मैं तो मैं हू फिर मैं कैसे,
गलती कर सकता हूं

जो किया मेरे से पहले थे,
उनकी वजह से हुआ,
ओ ऐसा नहीं करते तो,
ये नही होता, 
मेरी गलती नही !

मैं तो हमेशा सही करता हूं,
जो उन्होंने किया था,
ओ पूरा का पूरा गलत।
ओ सही नहीं थे, 
मैं कभी गलती करू 
हो ही नही सकता,
मैं जो गलत करता हूं,
उनमें में भी उनकी ही गलती है,
मेरी गलती नही है।

मेरे बारे में गलत सोचना,
आपकी गलती मेरी नही,
मैं जैसा भी हूं उसमे,
मैं करू उसमे भी,
मेरी गलती नही।

मैं दुनिया में आया तो
इसमें मेरे मां बाप की गलती
जो करता हु उपर वाले की मर्जी
मेरी गलती नही 


फिर भी क्यों ?

,

ओ तो जगतपालनहार प्रिया
लक्ष्मीअवतार है न,
पल में क्या नही कर सकती,
कल्पना से परे है न,
फिर भी क्यों ?

 

नंगें पाव वन गमन,
कुटिया मेंं  निवास
पकवान नही फलों का सेवन
क्यों क्यों आखिर क्यों ?

फिर भी लक्ष्मी स्वरूपा का, 
पापी नीच करता अपहरण
क्यों असहाय विलाप
जिसकी इच्छा मात्र से,
प्रलय हो भयंकर , 
उसका अधम करता अपहरण
आखिर फिर भी क्यों ?

 

जिसके एक तिनके से,
भयभीत त्रिलोक विजई, 
जिस पर रावण दृष्टि तक न,
ठहर पाई, फिर भी क्यों ?
अग्नि् परीक्षा की घड़ी आई।
अग्नि् परीक्षा देने पर भी,
तोहमत लगाई।
फिर वन वन भटके सीता माई,
जगदीश पत्नी है न, 
फिर भी क्यों ?
जिनके एक आवाज पर
पालन हार क्या न कर सकते,
धरती भी थी थर्राई, 
फिर भी क्यों ?
गोद में जिसके समाई




यह कविता एक प्रश्न है आप खुद विचार करे । 




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