घमंड तो होना स्वाभाविक है न,
मानव है न , होता है, चलता है।
पर प्रकृति के नियमो से परे,
अहं ब्रम्हास्मि, अहं ब्रम्हास्मि।
अति का अंत तो होता ही है न,
रावण तो प्रकांड पंडित था न,
राक्षस कोई प्रजाति तो नही,
विचारधारा, मानवसोच,घमंड
इंसान को रावण बना देता,
अहं ब्रम्हास्मि, अहं ब्रम्हास्मि।
आज भी वही है मेरी सुनो,
मेरी मुर्गी की ढाई टांग,
स्वार्थ सिद्धि हेतु सब ताक पर,
मेरी सुनो, मैं मैं और कोई नही,
अहं ब्रम्हास्मि, अहं ब्रम्हास्मि।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे,
घमंड ज्ञान का तो,
संजू को भी आता है न,
पर हे विधाता, कण कण
अणु परमाणु ब्रम्हांड रचनाकार,
नमन तुझको बारंबार,
तेरी श्रष्टि तेरा संसार,
अपने कर्तव्यों पर भी कहे,
अहं ब्रम्हास्मि, अहं ब्रम्हास्मि।

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