ज़मीर भी है नहीं



कभी तो अपना फर्ज अदा करो,
नसीब से  मिला है ये जन्म,
इंसान हो तो इंसान बने रहो,
क्या कहे ज़मीर भी है नहीं।
तुम से परेशान इंसान ही नहीं,
ऊपर वाला भी  हैरान है।
बेच चुके हो इंसानियत,
ईमान भी बिक चुका है,
सब कुछ तो बेच चुके हो,
क्या कहे ज़मीर भी है नहीं।
लोग परेशा है पर तुम नही,
वक्त सब का आता है,
मौका सबको मिलता है,
क्या कहे ज़मीर भी है नहीं।
तुम्हारा बस चले तो,इंसान क्या!  
भगवान को बेच खाओ।
कहते है ऊपर वाला सब देखता है,
ओ तो लगता है तुम्हे पता नही,
हर जीव का विधान तो होता है,
थोड़ा सा अपना ज़मीर रखो,
तुम्हारा तो ज़मीर भी है नहीं।




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