मेरा छोटा सा प्रयास है, अपने विचारों को कविता के माध्यम से रखने का। कुछ त्रुटी हो सकती है, अपने सुझाव जरूर दे।
अर्जुन बन जाऊ
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
पीड़ा तो होती है न !
पीड़ा तो होती है न ,
सफ़र
वक्त आने दे ,
मेरी गलती नही !
फिर भी क्यों ?
,ओ तो जगतपालनहार प्रिया
लक्ष्मीअवतार है न,
पल में क्या नही कर सकती,कल्पना से परे है न,
फिर भी क्यों ?
नंगें पाव वन गमन,
कुटिया मेंं निवास
पकवान नही फलों का सेवन
क्यों क्यों आखिर क्यों ?
फिर भी लक्ष्मी स्वरूपा का,
पापी नीच करता अपहरण
क्यों असहाय विलाप
जिसकी इच्छा मात्र से,
प्रलय हो भयंकर ,
उसका अधम करता अपहरण
आखिर फिर भी क्यों ?
जिसके एक तिनके से,
भयभीत त्रिलोक विजई,
जिस पर रावण दृष्टि तक न,
ठहर पाई, फिर भी क्यों ?
अग्नि् परीक्षा की घड़ी आई।
अग्नि् परीक्षा देने पर भी,
तोहमत लगाई।
फिर वन वन भटके सीता माई,
जगदीश पत्नी है न,
फिर भी क्यों ?
जिनके एक आवाज परपालन हार क्या न कर सकते,धरती भी थी थर्राई,फिर भी क्यों ?गोद में जिसके समाईयह कविता एक प्रश्न है आप खुद विचार करे ।
बुराई पर जीत
आंख बंद
आंख बंद करके सोशल मीडिया को धरती पर विश्वास, चलते हैं ये लोग जीवन की अनदेखी के संग।
खोये हुए हैं वो खुद को इस व्यस्तता में, रंगी हुई दुनिया में, खो गए अपनी पहचान।
लगाते हैं विश्वास उन पोस्टों की आँधी में, जो छिड़कती हैं झूलती समाज की विभिन्न रंगिनी।
जीवन के असली मोमेंट्स से दूर चलते हैं ये लोग, खोये हुए हैं स्वयं को अपनी ही सोच की झूली में।
आंखों की जगह इन्टरनेट ने हमें ले ली है, सच्चाई के आईने अब नजदीक आते ही छिप जाते हैं।
खराब होते हैं अपने आपसी संबंध इन मशीनों के सामर्थ्य में, ज़िन्दगी की सौभाग्यशाली रेलगाड़ी से हो गयी है वो वंचित।
समय खरीदते हैं इन्टरनेट के मोल बाजार, भूल गए हैं वो साथी, जो हैं सच्चे और अमानतदार।
ज़िंदगी जीने का वो मज़ा छिप गया है जहां, आंख खोलो, विश्वास रखो, और साथी ढूंढो अपने मन के कोनों में।
न जाने क्या हो अगले पल।
दिया तले अंधेरा
रोना आ रहा पर
अग्निपरीक्षा
सत्य की परख के लिए,
मेरी मर्यादा
ऐसी हो इस बार की होली
तो क्या सत्य पराजित हो सकता है ?
अजीब सा प्रश्न आ रहा मन में.
उसकी हर रचना का उद्देश्य है
ऐसा मेरे साथ ही क्यों ?
हम नही बदलेंगे अपनी सोच
अपने विचार रखे
अजीब सी है पूर्व पश्चिम की उलझन, उल्टा सीधा, सीधा उल्टा। वेश परिवेश खान पान जल वायु नहाना धोना नाते रिश्ते वार त्यौहार सबके अपने अपने । दोन...
एक नजर इधर भी
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उठो जागो चलो, हो जाओ तैयार। नही तो, होगा भविष्य बेकार। जो सोवत है सो खोवत है। अभी नही तो कभी नही। बिना मांगे कुछ नही मिलता, अपने हक के लिए, ...














